चक्रव्यूह लिरिक्स (Chakravyuh Lyrics in Hindi) – Narci

चक्रव्यूह के हिंदी बोल | Narci का महाभारत के अभिमन्यु पर आधारित दमदार रैप सॉन्ग। वीरता, धोखे और एक पिता के दर्द की कहानी। लिरिक्स अभी पढ़ें।

Chakravyuh Song Poster from Narci

Chakravyuh Lyrics in Hindi – Full Song Lyrics (चक्रव्यूह)

[द्रोणाचार्य]
कल मेरा संकल्प पूरा होने के लिए
तुम्हें अपना कार्य पूरा करना होगा

[जयद्रथ]
मुझे क्या करना होगा आचार्य?

[द्रोणाचार्य]
तुम्हारा कार्य है भीम और अन्य पांडवों को
चक्रव्यूह में प्रवेश से रोकना, 
केवल एक को छोड़कर।
................................
[नारसी]
जब भी रण में लेके दौड़ा,
वो तो बिन डर के ही घोड़ा
वार छोड़ा सीधा सीना शत्रुओं का खोला
थे माधव जिनके सारथी, ये उनका बेटा शोला
वीर अभिमन्यु, थी आयु जिसकी सोलह

नई सुबह हुई, दिन आया तेरहवाँ
किसे पता था कि क्या है आज झेलना?
आज रण में ना धर्म का भी मेल था
था क्या होने वाला? नहीं थी ये चेतना

बीती रात के बारे में क्या ही बोलना?
गुरु द्रोण ने कर दी मृत्यु घोषणा
अभिमन्यु ये कैसे भला सोचता?
कि पिता के गुरु रचेंगे मृत्यु की योजना

नीति को निभा के ना यूँ समय कर व्यर्थ तू
सही और गलत का ना मुझसे पूछ अर्थ तू
पीछे रहा धर्म, आगे रिश्ते न दिखे
लहू को बहाने हेतु रचा था ये चक्रव्यूह

तुझे नहीं पता यदि क्या है होता चक्रव्यूह
तो बातें मेरी ध्यान से हाँ सुनते रहना तू
सात घेरे लिए होंगे कुंडली का रूप
घेराबंदी ऐसी होगी, कांप जाए रूह

भीतर आने हेतु चाहे दे दे वार सभी
भीतर आके मिले ना निकास द्वार कभी
सैनिकों की परतें देंगी उलझा तुझे
आखिरी में अस्त होगा प्राण रूपी रवि

रणभूमि से दूर रोका सुशर्मा ने अर्जुन को
अर्जुन और केशव के आगे खड़ा बनके दुश्मन वो
बाधा बना ताकि रथ पहुँचे ना अभिमन्यु तक
बाकी पांडव सोचें कैसे भेदें वो तो बंधन को
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[अर्जुन]
कुरुक्षेत्र में सब कुछ ठीक तो होगा ना?

[कृष्ण]
युद्ध के मैदान में ठीक कुछ हो सकता है, अर्जुन?
बस इतना कह सकता हूँ, जो होना है वही होगा
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[नारसी]
बाण साध डोर पे, वो पीछे खींचे हाथ हाँ
सेना की ना देखी आँख, जांघ, टांग, माथ हाँ
युद्ध हुआ भीषण ऐसा, वैरी पड़ा राख हाँ
सुशर्मा और साथियों पे क्रोध गिरा पार्थ का

रण पे खड़े भाइयों आगे अभिमन्यु पेश
प्रणाम करके बोला, कैसी चिंता पिता ज्येष्ठ
क्या हुआ जो पिता नहीं, अभी खड़े साथ हैं
अर्जुन का ये बेटा लेगा चक्रव्यूह को भेद

चलते रहना साथ मेरे, जब दरवाज़े काटूंगा
वैरी को जला दूँगा मैं रूप लेके भानु का
दिल में यही खेद बस, सुनो पिता ज्येष्ठ
भेदना तो आता है, पर कैसे लौटूँ? जानूँ ना
................................
[जयद्रथ]
आने दो इन्हें,
इसी लिए तो बनाया है ये नरक द्वार

[अभिमन्यु का सारथी]
ये तो अनंत भूलभुलैया है, कुमार अभिमन्यु
................................
[नारसी]
जयद्रथ रोके बाकी पांडवों को पीछे ही
धोखा रखा अग्रता, युद्ध नीति नीचे ही
चक्रव्यूह में घेरा बस उस अकेले योद्धा को
यहीं राह चुन चुके थे सारे ही अनीति की

बोला अभिमन्यु था पिता गुरु द्रोण से
युद्ध नीति नियम हैं ये, बोलो भला कौन से?
नियम जो बना गए थे गंगासुत युद्ध के
सारे आज कर डाले हैं रणभूमि में खोखले

कहता हूँ मैं ठोक के कि धर्म मेरे साथ है
वासुदेव गुरु जिनके किस्से ही भी तो व्याप्त हैं
आगे चाहे दस खड़े, चाहे दस लाख हैं
अर्जुन का ये बेटा हाँ, अकेला ही पर्याप्त है

नियमों को भूल बैठे, देखो आगे कौन?
कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, गुरु द्रोण
दुर्योधन, दुःशासन, और शकुनि भी रौंद
गए सारे रिश्तों को, ज़मीर उनके मौन

चले वो तो छीनने थे उसकी प्राणवायु
ना रिश्ता देखा किसी ने, ना देखी उसकी आयु
सोलह सालों का वो बालक घिरा उन सातों से
चाहते थे वो देखना उस वीर को अल्पायु

खड़ा सीना तान के था जैसे हाँ पाषाण वह
प्यासे उसके बाण माँगें वैरियों के प्राण थे
बाण चले, मृत्यु तांडव कर रहे बयान थे
अर्जुन का है बेटा, देता पूरा ही प्रमाण वह

घायल उसको करने के थे द्रोण बने कारण हाँ
अंगराज कर्ण ने तोड़ दिया धनुष उस बालक का
कृपाचार्य खंडित करता रथ, घोड़े, चालक हाँ
भूमि पे गिरा, पर खड्ग का बन चुका धारक हाँ

आयु उसकी सोलह थी और साहस उसका दोगुना
ढाल थामे, खड्ग से वो वार करता चौगुना
जाल चक्रव्यूह था बालक हेतु जो बुना
वहीं लड़ा, सांसों को था पूरी तरह वो भूला

ढाल तोड़ी वीर की मिलके सबके वारों ने
सोचो क्या ही भय होगा उस बालक का सारों में
पड़ा था वो अर्धमरा, फिर भी ना वो रुका था
रथ का ही पहिया था उठाया दोनों हाथों से

चक्रव्यूह में वो अकेला बन चुका था चक्रवात
पहिए को घुमा के तोड़े सबके लात, हाथ, माथ 
बरसे वो तो शत्रुओं पे जैसे मानो उल्कापात
बेटे में ही दिख चुके थे सबको उसके पिता पार्थ

रक्त लाल बहा लेके काला था अध्याय
अस्त्रहीन वीर संग हो रहा अन्याय
लेटा असहाय, वार सहता जाए
साँसों को वो भला और कैसे ही बचाए?

काया उस वीर की तो भूमि पे आघात थी
और नहीं जिएगा ये बात सबको ज्ञात थी
दुःशासन के बेटे ने था वार किया आखिरी
वीर अभिमन्यु ने वीरगति प्राप्त की

माँ बैठी प्रतीक्षा में, ये उनको कौन बताएगा
बेटा अब कभी भी “माँ” नहीं कह पाएगा
आना उसका तय था, पर किसको था ये पता
घर तो वापस आएगा, पर साँसें नहीं लाएगा

सूर्य नया युद्ध का जो आसमान पे छाएगा
जब भी हाथ पार्थ का हाँ धनुष को उठाएगा
कमी अभिमन्यु की बोलेगी ये पिता को
आज रणभूमि वो साथ नहीं जाएगा
................................
[अर्जुन]
प्रतिदिन सांझ को वो मेरी प्रतीक्षा करता था।
हम युद्ध से साथ वापस आते थे।
और वो बताता था कि
आज युद्ध में क्या जीता? क्या हारा?
लेकिन आज…
आज जब मैं उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
वो आया नहीं, केशव।

👉 In Romanized - Chakravyuh Lyrics

गीतकार: नार्सी


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About Chakravyuh (चक्रव्यूह) Song

यह गाना, Chakravyuh, Narci द्वारा रचित और गाया गया है, जो महाभारत के एक दुखद और वीरतापूर्ण प्रसंग - अभिमन्यु की कहानी को बयान करता है, गाने की शुरुआत द्रोणाचार्य और जयद्रथ के संवाद से होती है, जहाँ द्रोणाचार्य जयद्रथ को चक्रव्यूह में भीम और अन्य पांडवों को प्रवेश से रोकने का कार्य देते हैं, केवल एक को छोड़कर, यहीं से वह षड्यंत्र शुरू होता है जिसका शिकार अभिमन्यु बनता है।

Narci की रैप के माध्यम से, हम अभिमन्यु की वीरता और उसकी मजबूरी को महसूस करते हैं, वह सोलह साल का बालक है, जो चक्रव्यूह को भेदना तो जानता है, लेकिन उससे बाहर निकलना नहीं जानता, गाने में बताया गया है कि कैसे सुशर्मा ने अर्जुन को रणभूमि से दूर रोक दिया, और कैसे जयद्रथ ने बाकी पांडवों को पीछे रोककर अभिमन्यु को अकेला छोड़ दिया, फिर चक्रव्यूह के भीतर, द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, दुर्योधन जैसे महारथियों ने मिलकर एक बालक के साथ अन्याय किया, उसका धनुष तोड़ा, उसके रथ को नष्ट किया, लेकिन अभिमन्यु ने हार नहीं मानी और अंत तक लड़ता रहा।

गाने का अंत बहुत ही मार्मिक है, जहाँ अर्जुन की पीड़ा को दिखाया गया है, वह हर दिन युद्ध से लौटकर अपने बेटे अभिमन्यु से मिलता था, लेकिन आज वह प्रतीक्षा करता रह गया, यह गाना सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि वीरता, धोखे, और एक पिता के दर्द की गाथा है, जो आज भी दिल को छू जाती है।